फैसला लेना सिखा नहीं था तभी दो रास्ते मिल गए,

डर और दुविधा दोनों मेरे पास आ गए 

डर ने रोकते हुए कहा थम जा और पिछे चल ,

दुविधा ने कहा किसी एक राह पे चल 

कश्मकश थी मन मे सही कौन डर या दुविधा ,

मन से आवाज़ आई डर से क्या डरना दूर कर ये बाधा 

मन की सुनी और उन दो रास्तों पे नज़र गई ,

दोनो मश्खरी करते हुए बोले ये तो हमसे डर गई 

मैं नि:संकोच दोनों रास्तों को देखती रही ,

अंतर्मन से जूझ रही थी कौन सा रास्ता गलत कौन सा सही 

सिक्का भी न था मेरे पास उछालने को ,

चित और पट होते मेरे पास सही राह दिखाने को 

बढ़ी मैं आगे निडर निर्भय होकर ,

मश्खरी सन्नाटे में बदली जब पड़ी उन रास्तों की मुझपे नज़र 

अब दुविधा उन रास्तों के मन में थी ,

और राह चुनने की ज़िम्मेदारी मेरी थी 

चुन लिया एक रास्ता बढ़ चली आगे ,

देखा फूल और रौशनी थी उस रास्ते को साज़े 

हर्ष और उल्लास महसूस हुई मुझे ,

कोई दुविधा न थी अब जिससे दिल जूझे 

चुना रास्ता सही था समझ आ गया ,

खुशी इस बात की थी मुझे अब फैसला लेना आ गया !!