माना दूरियाँ कुछ बढ़ सी गई हैं,

नज़दीकियाँ अब मुमकिन नहीं |

ख़ामोशियाँ भी बयाँ कर रही हैं ,

दो लफ़्जों का पल अब गवारा नहीं |

निगाहें अब झुकने लगी हैं ,

आँखों से छुना यादें बन गई हैं |

फासलों से अब तकलीफ नहीं ,

पास रहकर भी जब थे हम साथ नहीं |