राह में बिखरे कांटे थे , पैर सने खून से जाते थे । 

दर्द की परवाह किये बिना , मंज़िल की तरफ बढ़ता ही रहा। 

मैं तो बस चलता ही रहा । 

 

पहले ने कहा कि मुश्किल है, दूसरा बोला असंभव है । 

तीसरे ने कहा कि अब तक कोई ना कर पाया । 

चौथा बोला तुमसे ना हो पायेगा । 

उन 'चार' लोगो की बातों को,

सुना अनसुना करते हुए, मंज़िल की तरफ बढ़ता ही रहा। 

मैं तो बस चलता ही रहा । 

 

कुछ लोग मिले अनजाने से, जो राह के साथी बन गए । 

कुछ बिछड़ गए पहचाने से, जो किसी वजह से रूठ गए। 

जो रूठ गए, उन्हें दुआएं दे कर । 

जो साथ चले , उनका हाथ थामकर , मंज़िल की तरफ बढ़ता ही रहा। 

मैं तो बस चलता ही रहा । 

 

वो रात बहुत ही काली थी, होंसलो को हराने वाली थी । 

ना कोई राह, ना ही डगर , आता नहीं था कुछ भी नज़र । 

एक आवाज़ बहुत दूर से आयी । 

और कहा, जब आँखे देख ना पाएं, तब मन की आँखे खोल

'उस' के दिखाए रास्ते पर, मन की आँखों से देखकर, मंज़िल की तरफ बढ़ता ही रहा। 

मैं तो बस चलता ही रहा । 

 

आखिर वो दिन भी आ ही गया , जब मंज़िल सामने नज़र आयी। 

अब ना कोई संघर्ष और ना ही कोई दुःख होगा। 

मंज़िल बोली मैं तो पड़ाव हूँ , लम्बे सफर में ठंडी छाँव हूँ। 

आ बैठ , थोड़ा सुस्ता ले, नए पड़ाव को बढ़ने से पहले। 

मन दुःखी हुआ, और पूछ लिया - क्या सब कुछ पा लेने पर भी संघर्ष है?

मंज़िल बोली कुछ पाने में नहीं, खुद को खोकर, 'उस' का हो जाने में ही हर्ष है ।  


फिर सूरज निकला , आयी नयी किरण, 

फिर शुरू हुआ एक नया सफर,

अब कुछ पाने के लिए नहीं, खुद को खोकर, 'उस' का हो जाने के लिए, 

एक नए पड़ाव की तरफ , बढ़ता ही रहा।  

मैं तो बस चलता ही रहा । 


By संयम दवे