अंतिम युद्ध

 

वो कहते जिसे महान हैं, लिखते भारत की शान हैं।

उस राजा के जीवन का मैं, एक हिस्सा आज सुनाता हूँ।

कुछ कहने से वो चूक गए, कुछ लिखना शायद भूल गए।

कैसे उसने गढ़ जीता था, वह किस्सा आज सुनाता हूँ।  


जब दुर्ग को उसने घेर लिया, कई महीनो तक संघर्ष चला,

आखिर वो दिन भी आ ही गया, जब अन्न जल सब खत्म हुआ।

अपने पुरखो को याद कर, इतिहास को दोहराना था,

मातृभूमि पर मर मिटकर, उन्हें अमर हो जाना था।

 

उत्साह था, उमंग थी, आनंद का संचार था ,

चित्तौड़ के उस दुर्ग में , आज सबसे बड़ा त्यौहार था। 

उन रण-बांकुरो के घर की, माँ -बहू - बेटी निराली थी,

जिन वीरांगनाओ की काया , कल चिता पर सजने वाली थी।

 

वो सजी थी दुल्हन की तरह, आज सुहागन मरने को ,

अखंड सौभाग्यवती भव के, आशीष की लाज रखने को।

फिर तिलक लगाया भाल पर, और दिया जलाया थाल पर।

आज लौट कर ना आना प्रिये, मैं चिता सजाने जाती हूँ।

तुम रण से स्वर्ग चले आना, मैं अग्निपथ से जाती हूँ ।

 

केसरिया साफा बांधकर, म्यान से खड्ग निकालकर,

सिंहो की सेना चली, सांसारिक बोझ उतारकर।

वहां चिता की अग्नि सुलग गयी, यहाँ गढ़ की देहरी छोड़ गए,

महादेव के जयघोष से, दुश्मन के इरादे डोल गए।

 

नायक उनका घायल था, ना घोड़े पर चढ़ पाया था,

एक अद्भुत रण-बाँकुरे ने, उसको कंधों पर बिठाया था।

फिर युद्ध बहुत घनघोर हुआ, न देखा, न सुना, न जाना था ,

मातृभूमि पर मिटने का, उनका अंदाज़ निराला था।  


एक सिंह से वो लड़ते आठ थे, क्या वीरगति के ठाठ थे।

धीरे धीरे एक एक कर, वो सूरज-से ढलने लगे,

शीश धरा पर गिरते ही, स्वर्ग की राह चलने लगे।

मगर वो युवक और कंधो पर नायक, जैसे हनुमान और राम थे ,

अंतिम युद्ध , अंतिम पहर , का अंतिम परिणाम थे।

 

वह नायक फिर घायल हुआ, कंधों से भूमि पर आ गिरा ,

अपने नायक की रक्षा को, वह युवक भी घोड़े से उतरा।

दुश्मन के लिए ये मौका था, पीछे से आ कर वार किया, ,

शीश कटा, गिरा धरती पर, मृत्यु से साक्षात्कार किया।

पर ये अंत न उसे स्वीकार हुआ, और फिर एक चमत्कार हुआ ,

सर कटा तो क्या, धड़ बाकी है, हाथ में खड्ग , लक्ष्य शत्रु की छाती है,

मन वज्र से भी कठोर था, वो रण में पला राठौड़ था ,

उठ खड़ा हुआ बिना सर के, तब अंत की शुरुआत हुई ,

ऐसे योद्धा को देखकर, दुश्मन की रूह भी कांप गई ।

 

उस तरफ एक विजेता था, जो जीतकर भी हार गया,

इस ओर मिट्टी के लाल थे, जो लड़ते लड़ते अमर हुए । 


ऐसे मातृभूमि के रक्षक, सदियों तक जाने जायेंगे,

इतिहास के पन्नों में ना सही, लोकगीतों में याद किये जायेंगे।

इतिहास के पन्नों में ना सही, लोकगीतों में याद किये जायेंगे।

 

जय हिन्द

(-By संयम दवे )