किसी बद नसीब से छीनकर
बटी उम्रभर वो खैरात थी
वो सवेरा था जिसे ढूंढता
मैं कयामतो कि वो रात थी
मैं दफन हो कामिल हुई
अब तलक तो न तमाम थी
मै जिस्म थी मैं दूर थी
अब रूह हूं तेरे पास हूं
मिला अब मुझे मेरा पता
तेरा खत हूं तेरे नाम हूं
शुर्क उसके रहम का ये
मंजिल पे तेरे साथ हूं
-संवाद
