"मैया,गोवर्धन न अबके उठाऊ
न काली नाग मार भगांऊ,
मानव अहम हुआ इन्द्र समान
धर्म का न होवे सम्मान,
कालीया विष लालच चहूं ओर
कंस चरित्र जगत सिरमौर,
पीड़ा मे पशू, निर्धन नर नारी
कलुषित हुई वर्दावन सी सृष्टी सारी,
न भजो मोहे अब,न करो मोरा ध्यान
कलयुग का न हो मोसे कल्याण"
-संवाद हरी दुख से
