न अमीर बनने की चाह थी और न ही वैभव की  

बस रोटी की लालसा में छोड़ा था गाँव

टूटी चप्पल, फटी कमीज और बेबसी,

मायूसी और मुश्किल में उलझा आग़ाज़

पास में कुछ कपडे, थोड़ा खाना,

ओह ये सिर पर सपनो की गठरी का बोझ...

कड़ी धूप और वीरान रास्ता..

कभी कभी दिख जाते कुछ लोग,

कभी भूखे कुत्ते, प्यासी चिड़िया,

जिन्हे शायद अब खाना पानी नहीं, 

मौत की तलाश है...

हमें थोड़ी देर रुकना है,

नहीं हम थके नहीं,

फिर भी बस थोड़ी देर रुकना है...

हम "धूप" की "छाव" में सुस्ताकर फिर चलेंगे...  

सामने से एक मोटर गाड़ी आई है,

गाड़ी में पुलिस है,

कुछ बड़े अफसर और एक दरोगा,

दरोगा के हाँथ में डंडा है,

हमारे हाँथ में हमारे बच्चे की उंगली ...   

उसके कंधे पर "सितारे का रौब" है,

हमारे कंधे पर रोटी और जिम्मेदारी का बोझ...

दरोगा ने हमें फटकार लगाई,

हमने अपने गांव पहुँचने की गुहार,

"मास्क" कहाँ है , उसने पूंछा,

नहीं है बोलकर हमने बांधा अंगोछा...

और फिर फटकार लगते हुए वो चला गया...

हम लम्बी कतारों में खड़े किये गए...

सरकारी लापरवाही और उपेक्षा ने

सैकड़ो-हजारों लोगों की कर दी हत्या...

कुछ लोगों की आत्मा ने छोड़ा साथ

तो कुछ लोगों की उम्मीद ने...

हमारा गर्म खून ठंडा हो गया..

हमारे ठन्डे खून ने  

अप्रैल की धूप और गर्म हवा में

घोल दी ठंडक...

न ताबूत मिली, न कफ़न ,

न आग और न ही मिटटी,

धीरे धीरे बंद होती आँखों से

बह रही थी...

गाँव और रोटी की लालसा


-संतोष प्यासा