एक रात मेरी रावण से मुलाक़ात हुई ,

सामाजिक मुद्दों पर कुछ हमारी बात हुई 


दरअसल उस रात होना रावण का भाषण था,

परंतु दुर्भाग्यवश बस मैं अकेला श्रोतागण था 


मंच से उतरकर मेरे पास बैठते हुए,

आदत से विवश अपनी मूँछें ऐंठते हुए,

 

बोल पड़ा रावण, "सुनो बात हमारी भैया,

क्या आदमी भूल गया है सारी शर्म--हया?"


"ये बताओ जो ये हमारे पुतले पर बाण चलाते हैं,

बंधु क्या ऐसा करने से ये राम बन जाते हैं?"


"ख़ैर ये राम वाला तर्क भी अब पुराना हो गया है

सच्चे राम के हाथों जले हमें ज़माना हो गया है|"


"अब तो इन नक़ली रामों से काम चलाना पड़ता है

क्या करें दोस्तयह रिवाज है निभाना पड़ता है"


"तुम लाना तो आज का अख़बार ज़रा

और पढ़ो बुद्धिजीवियों के विचार ज़रा "


"भ्रष्टाचारग़रीबीघोटाले और भुखमरी

असाक्षरताआतंकवाद और बेरोज़गारी "


"ख़याल में उनकेहमारे सिरों के ये पर्याय हैं

एक ज्ञानी का ऐसा अपमानये कैसा न्याय है?"


"लैंगिक भेदभाव यही खोखले लोग करते है |

और फिर सारा दोष हमारे सिर क्यों मढ़ते हैं?"


"ये जो डेरे और आश्रम में छिपे रावण हैं,

ये जिन्होंने किया अनेक सीता-हरण है "


"आख़िर क्यों इन्हें बीच रस्ते जलाया नहीं जाता है

क्यों इन्हें मिटाकर इंक़लाब लाया नहीं जाता है"


"उलटा ये तो प्रजा के पैसों पर फूलते फलते हैं ,

और इनकी जगह बेवजह हमारे पुतले जलते हैं | 


"सार ये है कि अब तुम लग जाओ राम की खोज में,

बहुत दब चुके हो तुम कल्युगी रावण के बोझ से "


"वरना ये कलयुग के रावण ऐसे ही तुम्हें लूटा करेंगे,

फिर नक़ली राम बनकर हमारा पुतला फूँका करेंगे "


"अच्छा चलतें हैं हम देखो रात बहुत हो गयी

कारण अकारण ही हमारी बात बहुत हो गयी |"


इतना कहते ही रावण फिर आकाश में उड़ गया

और फिर मैं भी अपने घर की तरफ़ मुड़ गया 


रावण चाहता था कि तुम भी उसकी बात सुनो

दो रास्ते हैं सामनेजो सही लगे वो राह चुनो |


या राम के पथ पर चलकर पुनः राम राज स्थापित करो,

या कलियुगी रावण संग अपना नाम भी कलंकित करो 


बस इन्हीं कुछ मुद्दों पर हमारी बात हुई,

जब एक रात मेरी रावण से मुलाक़ात हुई