मैं आज भी वही पे खड़ा हूँ मैं आज भी वहीं पे खड़ा हूँ जहाँ तुम्हारा काजल फैला था मैं आज भी वहीं पे खड़ा हूँ जहाँ तुम्हारे आँसू बहे थे कुछ लब्ज़ होंठों ने तो कुछ लब्ज़ आँखों ने कहे थे जिन फूलों ने सुनी थी वफ़ाओं की झूठी बातें वो अब मूरझाँ चुके है वो पंछी जो हमारे साथ ताल मिलाते थे वो अब घर जा चुके है कम्बख़्त वक़्त रुक गया है मेरे साथ ना तो ये चलता है ना मैं ही चल पाता हूँ अब तो हवाओं ने भी इधर से रूख मोड़ लिया है क़तार अंदर क़तार हर शय गुज़र रही है किसी लम्हे की गोद में बस सिर्फ़ मैं वहीं खड़ा रह गया हूँ । है मूँज़मीद, है मूँज़मीद अब हर ख़्वाब , हर आँसू हर लज़्ज़त हर अज़ीयत हर मसर्रत की जैसे इनके माने खो गये है कहीं वो दरिचा - वो दरख़्त ऐसे देखते है जैसे अब मुझको पहचानते ही नही वो चाँद का घर , वो तारो का आँगन वो नर्म हवा , ख़ामोश फ़िज़ा अब मुझको जैसे अपना मानते ही नही उन पलों के परिंदे लगता है फिर से उस दरिया में लौट गये है जहाँ से वक़्त शुरू हुआ था मगर बस मैं वही पर खड़ा रह गया हूँ ! वो सारे हर्फ़ , वो सारे लब्ज़, वो सब जज़्बात यही ज़मीन पर पड़े है तुम नही हो ये उन्हें पता है मगर फिर भी अपनी ही बात पर वो अड़े है किसी यक़ीन से उस राह को देखते है जहाँ वीरान सा समुन्दर हर लहर के साथ किसी दर्द को किनारे पर फेंक जाता है मैं देखता हूँ की कहीं किसी लहर के साथ किसी सीप में बैठी तुम मिल जाओ अगर मेरे लिए न सही पर उन जज़्बातों के लिए तो आओ जो तुम्हारी राह देख रहें है उ न अल्फ़ाज़ो को उठाकर फिर से अपने होंठों पर रख दो उन सभी हर्फ़ो को जोड़कर इक नए माने हम बनाते है उस खला से उन पलों को फिर ढूँढकर लाते है आओ चलो अब किसी मोड़ पर बैठ जाते है अब मुझसे और खड़ा नही रहा जाता अब मुझसे और खड़ा नही रहा जाता ।।