ना चिख थी ना पुकार थीबस चलने की वो कलम थी...खत्म होने पर जो ,फिर सज थी फिर भरने को,ऐसी वो शाही थी..लिखकर मिटा देते थे ,फिर भी छाप उसकी थी..कलम के रंगो के भाती जिसका हर रूप है,नारी जिसका नाम है।
ना चिख थी ना पुकार थीबस चलने की वो कलम थी...
खत्म होने पर जो ,फिर सज थी फिर भरने को,ऐसी वो शाही थी..
लिखकर मिटा देते थे ,फिर भी छाप उसकी थी..
कलम के रंगो के भाती जिसका हर रूप है,नारी जिसका नाम है।