आंसू जो पलकों तक आ गयी है,
उसे बह जाने दो,
बात पुरानी है,
तक़लीफ़ देह भी,
उसे जाने दो।
वो नही आयेगा,
ये हक़ीक़त है,
तुम जानते हो,
इसे झूठ बतलाकर ,
क्यूँ खुद को उलझाये जा रहे हो।
छत पर आओ जरा चांद को देखो,
दुनिया खूबसूरत है सांझ को देखो,
क्यूँ ज़िंदगी को ,
बैशाख का दोपहर बनाये जा रहे हो।
खुलते कलियों को देखो,
उगते बीजों को देखों,
क्यूँ चेहरे को ,
मुरझाया हुआ फूल बनाये जा रहे हो।
ये जो इश्क़ है ,
इसमे मिट जाते है लोग,
जश्न मनाओ के , तुम जिये जा रहे हो। - राजहंस


