अंधेरा भी होगा, दिया भी जलेगा...

कभी परेशान सा होगा तू और अनजाने उसके दर बैठा मिलेगा...


कभी रावण होगा तू..

कभी नंदी भी होगा...

कभी दर्द से कराह उठेगा...

कभी आँखों से ख़ुशी का आंसू भी छलकेगा..


दुर्योधन को उसके कर्मो का दंड मिला था

पर

आखिर मे वो स्वर्ग के लिए भी तो चला था..

अपने घमंड पर उसे नाज़ था..

सारी ज़िन्दगी एक लक्ष्य मे झोंक दी

आखिर उसमे भी कुछ खास था..


शकुनि ने उसके कर्मों के धागे अगर पकड़े ना होते ...

दुर्योधन नर्क के द्वार पर खड़ा ना होता...

कहानी कुछ और होती महाभारत की ...

कृष्णा का उपदेश भी मिला ना होता


तू दुर्योधन ना बन.....रावण ना बन... अंधेरा ना बन...

तेरा कल भी तेरे आज के सहारे चलता है

हर कर्म जो तू करता है उसी फैसले से तेरा भविष्य पलता है

अर्जुन बन.... शबरी बन... अहिल्या बन..... प्रहलाद बन..... या दीवानी मीरा बन...


खुद को रौशनी से धागों से बांध ले तू...

आंसू की हर बून्द मे नहाया सा एक नन्हा सपना तेरी गोद मे गिरता है

जा मिल किसी शाम उससे वो भी तेरी ही खोज मे फिरता है


--- संजीदा