बेज़ुबान सा....., कुछ बेहया सा.....
इश्क़ है.... मुझे.....
अपनी सुबह की चाय की प्याली से....
मेरी माँ के साथ मिलकर रोज़ साजिश करती है.....
मुझे जगाने की....
ज़रा बेशर्म सी..... बेबाब सी......
अदा है उसकी.....
बेताबी से उठा कर..... बैठा भी देती है....
और फिर....
जो प्यार जताती है....
गले मे बाहें डाल...... मेहबूब ने जैसे......
पिछली रात के सारे गीले शिक़वे मिटा दिए हों....
-- संजीदा


