अपने आग़ोश में अनकहे, अनदेखे, अनसुने, अनछुए न जाने कितने एहसास समेटे चलता रहता है एक शख्स हमारे साथ , कहीं जाना नहीं होता ख़ुद उसको लेकिन अपने कर्तव्य बोध से बंधा चलता रहता है वो अनवरत हमारे साथ हमको अपनी मंज़िल तक पहुँचाने के लिए आख़िर है कौन वो ... जो इतना वफ़ादार है जो साथ होता है हमारे हर मंज़िल तक की यात्रा में वो सफ़र ही तो है सफ़र जो ठीक ज़िंदगी की तरह होता है जिसमें ना जाने कितने नज़ारे आते हैं और कितने जाते हैं इस नज़ारों की आवाजाही में बेहद ख़ूबसूरत होते हैं कुछ नज़ारे जिन्हें भर लेना चाहते हैं हम आँखों में हमेशा ,हमेशा के लिए और कुछ इतने भयावह जिन्हें भुला देना चाहतें हैं हम उसी क्षण और हमेशा के लिए ठीक इस जीवन यात्रा की तरह जिसमें जन्म से लेकर मौत तक रूबरू होते हैं हम ना जाने कितने अनुभवों से इन अनुभवों में से हम क़ैद कर लेना चाहतें हैं कुछेक को हमारे मन-मस्तक में एक हसीन याद बनाकर और कुछेक को भुला देना चाहते है पानी में उठने वाले ग़ुब्बारे की तरह जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता लेकिन नज़ारे हो या हो अनुभव सफ़र और ज़िंदगी के अहम भाग होते हैं हमें स्वीकारना ही पड़ता है इन्हें फिर चाहे ये अच्छें हो या बुरे कड़वे हो या मीठे क्यूँकि बिन इनके पूरा नहीं किया जा सकता कोई सफ़र और ना ही मंज़िल तक पहुँचा जा सकता है फ़र्क़ बस इतना है कुछ यादें दे जातें हैं तो कुछ सबक़ और यादों को भुला ही देना पड़ता है और सबक़ याद रखना पड़ता है क्यूँकि यादों के सहारे और बिन सबक़ नहीं पाया जा सकता मंज़िल को और ना ही पूरा किया जा सकता है किसी सफ़र को