थोड़ी सी नादान, थोड़ी सी मासूम

थोड़ी सी चंचल थोड़ी भयंकर

थोड़ी सी अकड़ वाली दिलों पे पकड़ वाली

थोड़ा सा लड़कपन थोड़ा बड़प्पन

यूं ही थोड़ी थोड़ी जो सबसे जुदा है

सूरत वो जाने कहां है।।

तिरछे काले नैनों में वो थोड़ा सा शृंगार करे

दो धारी तलवारों से मुझपर सीधा वार करे

थोड़ी मधुर थोड़ी सी कर्कश ऐसी जिसकी जुबां है

सूरत वो जाने कहां है।।

अधरों के शीतल तट पर लाल रंग का लेप है ऐसे

लिये लालिमा सूरज दादा निकले हों पूरब से जैसे

कमल से कोमल अधर हैं उसके जिनपे उसको गुमां है

सूरत वो जाने कहां है।।

जिनकी बात पे आकर मेरे बोल भी जाते डोल

रंग गुलाबी बनता जिनसे ऐसे उसके कपोल

बयां करूं क्या उसके रूप का वो तो सबसे जुदा है

सूरत वो जाने कहां है।।

                                                                                                     - संजय कुमार शर्मा 'प्रेम'