सभा के सभ्य लोगों के समक्ष ये बात रखता हूँ समझदारी के सरदारों मेरे जज्‍ब़ात रखता हूँ। जहाँ में ढूँढते हैं लोग दिले महबूब में बीवी मैं अपनी बीवी को महबूब बना के पास रखता हूँ।। सुखी संसार का बस है यही छोटा सा फलसफ़ा। खुशी का अकाल पड़ जाये वफा की बाढ़ रखता हूँ।। मकाने हुस्न की मजबूतियाँ ना सोचता हूँ मैं। दिवारे इश्क़ की मैं नींव को मजबूत रखता हूँ।। नहीं है मुझको ऐतबार मेरी इस देह पर यारों। है जब तक दीप में ज्योति मैं आँखें चार रखता हूँ।। गुलामी हुस्न की तुम छोड़ के तकदीर को चाहो। फिर तुम जान पाओगे कि मैं कैसे निरखता हूँ।। मेरी बातों से समझो ना मुझे बीवी का नौकर तुम। जो सब कहते हैं चोरी से वही मैं आम रखता हूँ।। वफा को चार बातों में बयां कैसे करे 'संजय'। मैं इस छोटी कविता से दिलों की बात रखता हूँ॥ सभा के सभ्य लोगों के समक्ष ये बात रखता हूँ समझदारी के सरदारों मेरे जज्बात रखता हूँ। जहाँ में ढूँढते हैं लोग दिले महबूब में बीवी मैं अपनी बीवी को महबूब बना के पास रखता हूँ।।