कोई संत करके दया, छोटा सा बीज उगाता देकर पानी खाद उसे, पौधेे से पेड़ बनाता रखता मन में माँ से भाव, करता लाड पिता सा काश कभी ऐसा होता कि मैं वृक्ष बन जाता.. पाये वो शीतल छाया, जो मेरे आंगन में आता कोई मुझेे पत्थर भी मारे, वो भी मीठे फल खाता दे कर तान हवा के साथ, मैं अपने गाने गाता काश कभी ऐसा होता कि मैं वृक्ष बन जाता.. सूर्य देव की तेज धूप से, मैं सबको आराम दिलाता इन्द्रदेव की बारीश में, सबका मैं छाता बन जाता बरखा हो या तेज धूप, सबका मैं साथ निभाता काश कभी ऐसा होता कि मैं वृक्ष बन जाता.. अपने हरे भरे पत्तों से, जीवों की मैं भूख मिटाता अपने पत्ते छाल तने से, मैं काम दवा के आता मेरी सूखी लकड़ी से, घर का खाना बन पाता काश कभी ऐसा होता कि मैं वृक्ष बन जाता.. मानव इतना करने पर भी, जब मुझको काट गिराता प्रदूषण और सूखे की, चिन्ता से मैं घबराता मानव की चिन्ता करके, मैं अपने नीर बहाता काश कभी ऐसा होता कि मैं वृक्ष बन जाता..