सपने खिड़की के इस पार हैं उस पार भी कौन कहता है कि सपनों को कैद नहीं किया जा सकता है? इंसान का कत्ल कर दो स्वप्न मर जाते हैं या फिर स्वप्न को ही मार दो इंसान मर जाएगा ... हत्या और आत्महत्या में यही एक फर्क है कोई मानने को तैयार नहीं परन्तु हर मौत संदेह के लाल रंग में लिपटी एक साजिश होती है * * * आंखों में बिखरा स्वप्न इंसान की मौत के बाद बहुत ही विरान हो जाता है और मौत ? कहा ना कि मौत तो बस साजिश है इंसान को उसके सपनों से अलग या फिर उसी की ही आंखों में कैद कर देने की ... क्या तुम नहीं जानते हर इंसान अपनी आंख में एक सपना लेकर मरता है ? शायद, इसीलिए हर मरी आंख खुली रह जाती है इंसान के मर जाने के बाद भी * * * मरने के बाद सपने क्या सचमुच आजाद हो जाते होंगे ? मुझे संदेह है सपनों की उस आजादी पर जिसे सबने उन्मुक्त कहा है ... इंसान को जलाने या फिर दफनाने से पहले सर्वप्रथम उसकी आंखें बंद की जाती हैं इस तरह हर एक सपना मौत के साथ ही गुलाम हो जाता है * * * इस तरह पहले सपनों को मारा जाता है फिर इंसान को उसी की बंद आंख के नीचे दफन का दिया जाता है मुझे संदेह है सपनों की उस आजादी और मौत के सम्पूर्ण सिद्दान्त पर जिसमें मौत को आत्महत्या का नाम दिया जाता है