अक्सर खेल में हार के बाद होती है समीक्षा,
तोला जाता है खिलाड़ियों का प्रदर्शन,
तय की जाती है जिम्मेदारी,
बदले जाते हैं कुछ अधिकारी,
और समीक्षक होते हैं वो लोग,
जो नहीं जानते खेल की बारहखड़ी।
उच्च स्तर पर चलता है दोषारोपण,
बातों बातों में खेल का चीरहरण,
कुछ गड़े मुर्दो को कब्र से उखाड़ा जाता है,
पुराने कागजों पे नया आदेश निकाला जाता है,
और रंग रोगन से बनायी जाती है नई रणनीति,
जो थोप दी जाती है जबरन खिलाडियों पर।
इस सब उठा पटक के बीच,
जीत जाते हैं समीक्षक और आलोचक,
कोई हारता है तो बस खेल और खिलाड़ी।
-संजू
