मैंने प्रेम की परिभाषा में,
तुम्हें सदैव राधा लिखा,
पर चाहकर भी स्वयं को,
कृष्ण नहीं लिख पाया,
क्योंकि मैं प्रेम की,
असीमित कठिन राहों में,
तुम्हारे सुख दुख का,
साझी बनना चाहता हूँ,
मैं प्रेम में कृष्ण नहीं,
दशरथ मांझी बनना चाहता हूँ।
-संजू


मैंने प्रेम की परिभाषा में,
तुम्हें सदैव राधा लिखा,
पर चाहकर भी स्वयं को,
कृष्ण नहीं लिख पाया,
क्योंकि मैं प्रेम की,
असीमित कठिन राहों में,
तुम्हारे सुख दुख का,
साझी बनना चाहता हूँ,
मैं प्रेम में कृष्ण नहीं,
दशरथ मांझी बनना चाहता हूँ।
-संजू