गाँव की हर स्त्री का चरित्र जानते हैं,
कुछ लोग खुद को नास्त्रेदमस मानते हैं।
कितना भी लम्बा हो घूंघट किसी का,
ये प्रौढ़ अन्तर्यामी सबको पहचानते हैं।
बैठते हैं चौपाल पर धूनी रमा कर,
कल्पनाओं में देहों की खाक छानते हैं।
आँखों में दूरदर्शी शक्तियाँ रखते हैं,
किस घर में क्या हुआ सब भानते हैं।
शाखें टूट गईं हैं पत्ते बिखर चुके हैं,
जड़ों की मूँछ मरोड़कर दिन रात तानते हैं।
-संजू


