ये जो दौर चल रहा है, मुझे डरा रहा है

अपनों को बेआबरू कर, गैरों से मिला रहा है।


ये जो सत्ताधीन हैं, बड़े निर्लज्ज हैं

आग जिंदगी में लगी हैं, पानी मुर्दों को पिला रहा है|


ये जो धर्मों का धंधा है, अब भी अच्छा है

वक़्त की फ़ितरत देखो, इंसा इंसा को बुला रहा हैं।


ये जो मेरे तेवर है, उसूलों की हिफाज़त है

वर्ना ज़मीर बेचकर भी, कितने घर चला रहा है।