माँ खा लेती है
जली रोटी
ठंडी चाय
अधपकी सब्जी
बस इस वास्ते कि
कल बेहतर होगा
और खुशियां घर आयेंगी।
माँ सह लेती है
बड़ों का गुस्सा
छोटों की बदतमीजी
अपनों का तिरस्कार
बस इस वास्ते कि
वक़्त जवाब दे देगा
और सब बदल जाएगा।
माँ सुन लेती है
समाज का तंज
पापा की भड़ास
पड़ोसी के ताने
बस इस वास्ते कि
कल वो भी सुनाएगी
अपने बच्चों की कहानियाँ।
माँ अक्सर भूल जाती है
अपनी जिंदगी
अपनी खुशी
अपने तकलीफें
अपनी कहानी
किसी ग़ैर के नहीं
अपनों के ही वास्ते।
~Sanjay Hrishu


