सड़क बनाने वाले मज़दूर,
सपने नहीं देखते शायद,
सड़क के किनारे,
एक घर के।
घर, जिसकी छत पर पैर पसारे फ़ुरसत से बैठ,
वो देख सकें, चाँद तारे आसमान में।
ना ही वो सपने देखते हैं, उन सड़कों पर,
एक चमचमाती कार दौड़ाने के।
उनके हिस्से के सपने अलग होते हैं शायद!
नहीं तो, आज भी क्यों,
वो सड़कें ही बना रहे हैं,
पीढ़ी दर पीढ़ी?
कहीं ऐसा तो नहीं,
कि उनके हिस्से के वे सपने,
कोई और चुरा ले जाता है?
जब वे सड़क बना,
कल की रोटी के सपने देखते,
सो रहे होते हैं थक-हार।
-संदीप गुप्ता SandySoil


