
सड़क बनाने वाले मज़दूर,
सपने नहीं देखते शायद,
सड़क के किनारे,
एक घर के।
घर, जिसकी छत पर पैर पसारे फ़ुरसत से बैठ,
वो देख सकें, चाँद तारे आसमान में।
ना ही वो सपने देखते हैं, उन सड़कों पर,
एक चमचमाती कार दौड़ाने के।
उनके हिस्से के सपने अलग होते हैं शायद!
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