कहीं ख़ुशियाँ बिक रही थी,
वो ख़रीद लाया, सारी, मेरे लिए,
कहीं ग़म बिखरा था,
उसने समेट लिया सारा, अपने लिए।
ख़ामोश रहकर, मुझे वो,
सिखा रहा है हुनर जीने का।
रंग इंद्रधनुष के जो,
भर रहा है कैनवास में मेरे,
वो चितेरा कोई और नहीं,
पिता के सिवा।
-संदीप गुप्ता SandySoil


