बहुत चाहा कि सपने देखूँ,आत्मनिर्भर भारत के।पर सपने जाते ही नहीं,शहर से गाँव लौटते,थके हारे, भूक से तड़पते,मज़दूरों के, फलक से।सच बताना,मैं पिछड़ी सोच वाला,तो नहीं हो गया हूँ कहीं?