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पिछड़ी सोच वाला आदमी


बहुत चाहा कि सपने देखूँ,आत्मनिर्भर भारत के।पर सपने जाते ही नहीं,शहर से गाँव लौटते,थके हारे, भूक से तड़पते,मज़दूरों के, फलक से।सच बताना,मैं पिछड़ी सोच वाला,तो नहीं हो गया हूँ कहीं?

— संदीप गुप्ता SandySoil
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