पेड़ों की जात नहीं होती।
न वो अपनी जात बताते हैं,
न पूछते है पंछियों से,
न पूछते है पथिकों से।
पेड़ों का कोई धर्म नहीं होता,
न वो अपना धर्म बताते हैं,
न पूछते है पंछियों से,
न पूछते है पथिकों से।
पेड़ कभी स्कूल नहीं जाते,
न ही किसी सत्संग,
फिर भी प्रेम की भाषा,
पेड़ों से बेहतर कोई नहीं जानता।
क्या हमें स्कूल,
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च,
से भी ज़्यादा समय,
पेड़ों के साथ बिताना चाहिए?
~संदीप गुप्ता SandySoil


