दूर तक, जहाँ तक मेरी आवाज़ जाती है,

उसके भी परे।

दूर तक, जहाँ तक, मेरी नज़रें देखती हैं,

उसके भी परे,

जहाँ तक मेरी समझ, समझ पाती है, 

उसके भी परे।

उन ऊँचाइयों पर, जो मेरी कल्पना से हैं परे,

कारगिल के उन दुर्गम पहाड़ों पर,

एक अंतर्दृष्टि से, मैं देखता हूँ,

एक प्रहरी खड़ा है, मौसम से बे-परवाह,

मेरे लिए।

मेरे देश के लिए।

मैं आश्वस्त हूँ,

कि मैं सुरक्षित हूँ,

मेरा देश सुरक्षित है।

मेरा मन और अंतर्मन,

उस प्रहरी को,

प्रणाम करते हैं।

ओ प्रहरी!

तुम्हें शत शत नमन!


~संदीप गुप्ता SandySoil