चलो चाँद पर चलते हैं!
कहो तो मंगल पर चले चलते हैं।
पर क्यों?
देख नहीं रहे तुम,
ज़मीं पर सब कुछ ठीक नहीं।
क्या ठीक नहीं?
देखा नहीं तुमने,
हाल इंसान का,
इंसान के तीमारदार का,
हाल इंसानियत का।
पर मैं क्यों चलूँ साथ तुम्हारे?
ये तो बताओ,
मुझे तो ज़मीं ही लगती है भली।
अब चलो भी! नख़रे न करो,
तुम्हारे बिना, मेरी कटेगी नहीं वहाँ,
एक से दो भले, कहते हैं कि नहीं।
मैं चला तो चलूँ तुम्हारे साथ,
पर ये तो बताओ,
वहाँ, चाँद और मंगल पर,
इंसान की एक नई नस्ल उगेगी,
या ज़मीं वालों की ही भीड़ वहाँ भी जमा होगी?
-कहासुनी ऋंखला की ५वीं कविता
~संदीप गुप्ता


