चलो चाँद पर चलते हैं!
पर क्यों?
देख नहीं रहे तुम,
ज़मीं पर सब कुछ ठीक नहीं।
क्या ठीक नहीं?
देखा नहीं तुमने,
हाल इंसान का,
इंसान के तीमारदार का,
हाल इंसानियत का।
पर मैं क्यों साथ चलूँ?
ये तो बताओ,
मुझे तो ज़मीं ही लगती है भली।
एक से दो भले, कहते हैं कि नहीं?
तुम्हारे बिना वैसे भी, मेरी कटेगी वहाँ नहीं।
मैं चला तो चलूँ तुम्हारे साथ,
पर ये बताओ,
वहाँ चाँद पर इंसान की एक नई नस्ल उगेगी,
या ज़मीं वालों की ही भीड़ जमा होगी?
~संदीप गुप्ता SandySoil
कहासुनी ऋंखला की ५वीं कविता


