जो तप कर गलता है,
गल कर ढलता है,
ढल कर निखरता है,
वो स्वर्ण तू ही तो है।
देश मेरा आगे बढ़ेगा,
जब जन जन ये ठान लेगा,
कि अलंकृत स्वर्ण से नहीं,
उसे, ख़ुद ही स्वर्ण होना है।
-संदीप गुप्ता SandySoil


जो तप कर गलता है,
गल कर ढलता है,
ढल कर निखरता है,
वो स्वर्ण तू ही तो है।
देश मेरा आगे बढ़ेगा,
जब जन जन ये ठान लेगा,
कि अलंकृत स्वर्ण से नहीं,
उसे, ख़ुद ही स्वर्ण होना है।
-संदीप गुप्ता SandySoil