इश्क़ होता है जो धीरे धीरे, वो मीठा होता है,

इश्क़ जो होता है वो, धीरे धीरे मीठा होता है।


धीमी धीमी आँधी, नफ़रत की, घोलती है ज़हर, फ़िज़ा में,

आँधी नफ़रत की, धीमे धीमे घोलती है ज़हर, फ़िज़ा में।

 

जो तू आँधियाँ उड़ा रहा है नफ़रत की,

घर तेरा भी तो इसमें एक दिन उड़ जाना है।


इश्क़ की हवा में, ज़िंदगी की पतंग उड़ा कर तो देख,

इश्क़ की छांव में थोड़ा ठहर कर तो देख,

इश्क़ का इतर थोड़ा लगा कर तो देख,

इश्क़ का इतर थोड़ा उड़ा कर तो देख।


~संदीप गुप्ता