ग़म-ए-ज़िंदगी भुला बैठे हैं अब तो,
न जाम की तलब है, न साक़ी की।
बेचैन फिर क्यूँ हुए जाता है, दिल ये नादाँ,
सुना है जबसे,
कि मयख़ाने फिर से जल्द ही महकने लगेंगे।
-संदीप गुप्ता SandySoil


ग़म-ए-ज़िंदगी भुला बैठे हैं अब तो,
न जाम की तलब है, न साक़ी की।
बेचैन फिर क्यूँ हुए जाता है, दिल ये नादाँ,
सुना है जबसे,
कि मयख़ाने फिर से जल्द ही महकने लगेंगे।
-संदीप गुप्ता SandySoil