उसे चाहिए थी जगह थोड़ी,
वह पसर गया पैर फैला।
उसे चाहिए थी खुली हवा,
उसने ख़रीद लिया आसमान।
उसे चाहिए था बिजली और पानी,
उसने नदी को दिया 'बाँध'।
उसे जाना था उस पार,
उसने चीर दिया पहाड़।
फिर एक दिन उसने,
यानी उस शहर ने,
गाँव से कहा,
देख!
मैने दिया तुझे कितना कुछ!
सुनकर शहर की बात,
गाँव रह गया सन्न।
भुनभुनाया मन ही मन,
पर शांत रहा,
एक सुसंस्कृत, अच्छे दोस्त की तरह।
मौन, ठीक वैसा ही,
उसके चहरे पर था पसरा,
जैसा,
एक बाप के चहरे पर छा जाता है,
जब,
उसका अपना बेटा,
उसे लाठी थमाए,
और उसकी क़ीमत भी जता दे।
चुप है, गाँव तब से।
क्या वह अब चुप ही रहेगा?
पर चुप वह, आख़िर रहेगा कब तक!!
~संदीप गुप्ता - SandySoil


