
चली परिक्षण करने, देखो, महर्षि दुर्वासा वरदान ।
दिया था मुनि ने रख, बाला भविष्य का ध्यान ।।
ज्योंही स्तुति कर लिया सूर्य का नाम ।
तत्क्षण गोद भर आया नंदन रश्मिरथी समान ।।
सफल परीक्षण देख, चकित हुई मखमल-सी इकबाली।
कहाँ छुपाऊॅ जीवन के इस अमुक अभिव्यक्ति की प्याली?
लौटालो वरदानी नंदन , हे अंशुमाली!
बाधित हूँ और विवश भी ,कहे प्रभु प्रभाकर,
पर देता हूँ अभेद्य कवच और कुंडल इसे अजेय बनाकर ।
जीवन में तम-तिमिर छाया था, सूर्य पुत्र क
Read More! Earn More! Learn More!
