वह निश्छल मन से मुस्काना,
मिट्टी को अमी बना खाना,
अवनि को ही बना पालना,
परियों की दुनिया में खो जाना,
बचपन के वो मनोहर पल ,
रह गए स्मृति बन कर ।
कुछ करने से न कतराना,
माँ -पापा का फिर आँख दिखाना,
मोटे -मोटे अश्रु मेरा बहाना
और दादाजी का फौरन मनाना,
बचपन के वो मनोहर पल ,
उड़ गए खग बन कर ।
दादी की राजा -रानी की कहानी सुनाना,
उन पात्रों को निद्रा में जीवित पाना,
नानी-मासी का पट,जर्सी बना पहनाना,
उसे पहन मेरा इठलाना,
बचपन के वो मनोहर पल,
बह गए बन निर्झर ।
चंदा को मामा बनाना
और जुगनू को तारा समझ जाना,
'मौजा' को 'मौना' और 'बाथरुम' को 'बनथुन' कह तुतलना,
सब के मन को यूं ही हर्षाना,
बचपन के वो मनोहर पल,
राह में मिलेंगे क्या वो कल?