नाकामियों के समुंदर में,निराशाओं की लहर थी
मेरे संघर्षों की कश्ती, सवार उसपर हर पहर थी
होसलों की पतवार से मैं, चीर रहा था समुंदर को
पर बदनसीबी थी मेरी, जो ना देख सका उस बवंडर को।
तन्हाई का वह बवंडर, अब मुझे तोड़ने लगा है।
मेरा होसला, मेरा आत्मविश्वास भी, अब मेरा साथ छोड़ने लगा है।
इस थके हुये तन को, अब समुंदर की गहराई भाने लगी है।
और मेरी सांसें भी अब, मेरा साथ छोड़कर जाने लगीं हैं ।