एक शेर आपकी नज़रसोचती हूँ दुनिया के इस मेले मैं, ग़मों न ही हमसे आशनाई कीजो कभी यह भी मुझसे रुठ के बैठ जाएँतो हयात-ए-तन्हाई की वो आखरी मन्ज़िल होगी
एक शेर आपकी नज़र
सोचती हूँ दुनिया के इस मेले मैं, ग़मों न ही हमसे आशनाई कीजो कभी यह भी मुझसे रुठ के बैठ जाएँतो हयात-ए-तन्हाई की वो आखरी मन्ज़िल होगी