Poetry 1 min read 151.5K reads

शेर


एक शेर आपकी नज़र

सोचती हूँ दुनिया के इस मेले मैं, ग़मों न ही हमसे आशनाई कीजो कभी यह भी मुझसे रुठ के बैठ जाएँतो हयात-ए-तन्हाई की वो आखरी मन्ज़िल होगी

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