Poetry 1 min read 214K reads

शेर


डालियों से गिरे पत्ते क़लील-ए-उम्मीद2 दे रहे हैंगिरे हुए तो हैं हम, टूटे अभी नहीं हैं

जाहां हयात-ए-कुद्रत के पनपे हैं सौ नज़ारेहम ही क्यूँ उसकी आगोश मैं ना बारहा खिलेंगे?

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