डालियों से गिरे पत्ते क़लील-ए-उम्मीद2 दे रहे हैंगिरे हुए तो हैं हम, टूटे अभी नहीं हैंजाहां हयात-ए-कुद्रत के पनपे हैं सौ नज़ारेहम ही क्यूँ उसकी आगोश मैं ना बारहा खिलेंगे?
डालियों से गिरे पत्ते क़लील-ए-उम्मीद2 दे रहे हैंगिरे हुए तो हैं हम, टूटे अभी नहीं हैं
जाहां हयात-ए-कुद्रत के पनपे हैं सौ नज़ारेहम ही क्यूँ उसकी आगोश मैं ना बारहा खिलेंगे?