नारी


त्याग की लपटों मैं जली, दहेज को अर्पित हुई

अज़ल से, चन्द सिक्कों के लिए, हिर्फत मैं बदली गई

हां उन्हीं से जो कहते थे तू घर की शान है


बन्द कमरों मैं रखा मुझे अन्धेरों से उलझती रही

ऐसे नगर देखे हैं मैंने जहां धूप हरियाली नहीं

हां उन्हो ने ही जो कहते थे तू घर की शान है


कभी मेरे हुस्न की चर्चा, और कभी मैं नकाब मैं रही

कहीं मुझे देवी का दर्जा, और कहीं मैं कोक मे खाक हुई

हां उन्हीं से जो कहते थे, तू घर की शान है


मगर मैं अबला नहीं हूँ, समर्थ्य, शक्तिवान हूँ

सिर्फ श्क्ल-सूरत नहीं हूँ, सीरत का वर्दान हूँ

सह गई बहुत सितम और पहरे, जो दुनिया, तूने दिए

आ मिला कन्धे से कन्धा, आज नई पहचान हूँ


हर खेल मैँ अव्वल हूँ ठहरी, हर फन मैँ कामयाब हूँ

कहीं मैं ममता की मूरत, कहीं देश की प्रधान हूँ

मैं कोई अबला नहीं हूँ, सामर्थ्य, शक्तिवान हूँ

सिर्फ श्क्ल-सूरत नहीं हूँ, सीरत का वर्दान हूँ


दफ्तरों मैं हूँ मैं अफ्सर, लश्करों की शान हूँ

बन्द कमरों सं निक्ल, मैँ आज जहाज़-राण हूँ

मैं कोई अबला नहीं हूँ, सामर्थ्य, शक्तिवान हूँ

सिर्फ श्क्ल-सूरत नही हूँ, सीरत का वर्दान हूँ


ना तेरी ररहम की, ना हरास की हक्दार हूँ

कद्र से अब कम न लूँगी, इस्का मैँ प्र्माण हूँ

आ मिला कन्धे स कन्धा,  मैँ नई पहचान हूँ