ऐ मानव, ये कैसे जंजाल में बस गया है तू?
अपने ही रचे चक्रव्यूह में फंस गया है तू।
शिकार तू और
शिकारी भी खुद है तू।
वो वादियाँ, वो खुले मैदान,
तेरे दोस्त सारे बुलाते हैं तुझे।
तोड़ कर बाहर निकल,
एक पिंजरे में कैद प्राणी लग रहा है तू!
सम्रिता®
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