ऋतु की रानी,
आई बरखा सुहानी।
भीगने को हर मन तरसे,
रुम-झुम, रुम-झुम,
उमड़-घुमड़ कर सावन बरसे।
झूमे धरती, तन-मन झूमे।
बागों में फ़िर पड़ गए झूले।
क्यारी फ़ूलों की खिल उठे।
भँवरों का फ़िर दिल मचले।
ऋतु की रानी,
आई बरखा सुहानी।
भीगने को हर मन तरसे,
रुम-झुम, रुम-झुम,
उमड़-घुमड़ कर सावन बरसे।
सम्रिता®
