बचपन में लुभाता,
खेल गुड्डे-गुड़ियों का।
पर शादी नहीं खेल तमाशा।
ना ही जीवन कोई खिलौना।
सोच समझकर बंधन में बंधना।
मिलन दो दिलों का,
बने गठबंधन दो परिवारों का। 
हाथों से मेहंदी का रंग भले ही छूटे।
रिश्तों की डोर कभी ना टूटे।
जब हाथ किसी का थामना,
ये बात याद ज़रूर रखना। 
सम्रिता®