ऋतु बसंत की आई,
संग चली, सखी-सहेली,
हमसफ़र मेरी पुरवाई।
मस्त मयुर डोले,
पपीहा पीहू-पीहू बोले।
कोयल की कूक पर,
अमराई ले अंगड़ाई।
रंग बिरंगी फ़ूल खिले,।
बागों में पड़ गए झूले
पीली सरसों लहराई,
चारों ओर हरियाली है छाई।
ऋतु बसंत की आई,
संग चली, सखी-सहेली,
हमसफ़र मेरी पुरवाई।

#सम्रिता®