झिलमिल, झर झर, कल कल बहती।
गाँव, राज्य, अनेक तटों से होकर गुज़रती।
प्यासों की प्यास बुझाती।
धर्म, ज़ात, वर्ण...  बेमानी बातों में ना उलझती।
'भेदभाव करें नादान,
सब सृष्टि की हैं संतान।'
ये सबक हमें सिखलाती।
एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ती।
सागर से मिलने को मचलती।
सृष्टि की अनमोल देन हैं,
धरती का गहना है नदिया।
चैतन्यमयी, जीवनदायिनी है नदिया।
'सृष्टि का सम्मान करो', कहती है नदिया। 
सम्रिता®