धरती से है सूरज नाराज़ कुछ।
हो गई है दोनों में अनबन कुछ।
क्रोध से सूरज की ज्वाला है जगी।
ज्वाला में तपकर धरती है सहमी।
सहम कर बेचारी धरती बोली,
"उफ़! इस धूप में तो मैं झुलस गई"।
अकड़ कर सूरज गुर्राया, बोला,
"तेरे बच्चों से हुई ये अनहोनी।"
भोली धरती समझ ना पाई।
इल्ज़ाम सुनकर हैरान हो गई।
पूछती रही, बच्चों की है क्या ग़लती?
सूरज ने फ़िर गलतियाँ गिनाई।
इंसानों ने काटे पेड़-पौधे।
आसमान में छोड़े ज़हरीले बादल धुँए के।
प्लास्टिक से होली मनाई।
पानी की बरबादी हुई।
"बस बस बस!" दुख से बिलख कर धरती रोई।
आँसू बहाते हुए बोली,
" मेरे प्यारे बच्चों, क्यों करते हो ये नादानी? "
जागो! अब तो सुधारो ग़लतियाँ अपनी।
बस करो ये मनमानी।
वरना होगी देर इतनी,
की पड़ेगी तुम्हारी धरती खोनी।
- सम्रिता®
