चौबीस-घंटे, शाम-ओ-सहर,
अपनों का ख़याल,
अपनों की फ़िकर।
अपनों की हर ख़्वाहिश, 
अपनों की हर ज़रूरत।
अपनों के लिए सारी मेहनत, मशक्कत।
यही होती है आम ज़िंदगी,
कम पडते हैं दिन के चौबीस-घंटे, शाम-ओ-सहर।
पर कुछ ख़ास ही होते हैं,
जो अपनों से दूर,
अपने वतन,
अपनी मिट्टी के लिए,
खुद को समर्पित करते हैं।
उनके लिए क्या चौबीस-घंटे,
क्या शाम-ओ-सहर। 
देश की सुरक्षा के लिए,
जीवन करते हैं न्यौछावर।
उन जाँबाज़ सेनानियों को,
देश के सिपाहियों को,
शत-शत-नमन।

-सम्रिता®