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चंद रुपयों के मज़दूर©

धरती का सीना चीर,
खुदाई करते यंत्र।
गड्ढा करते बहुत गहराई तक।
जितना गहरा गड्ढा, 
उतनी गहरी नीव।
जितनी मज़बूत नीव, 
उतनी ऊँची इमारत।
 
धड धड धड शोर मचाते यंत्र।
धूल-मिट्टी के बादल उडाते यंत्र।
उस शोर में, उस धूल-मिट्टी में सने मज़दूर।
फावड़ा, कुदाल लिए,
सिर पर तसले में,
पत्थर-मिट्टी का बोझ ढ़ोते मज़दूर।
 
कभी कड़ी धूप की भट्टी में तप कर।
कभी तेज़ बारिश की चपेटों को झेल कर,
दिन-रात खड़े।
बदलती ऋतुओं में, 
नीव मज़बूत करते मज़दूर।
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