श्रवण कुमार के माता पिता के दोषी को रोते देखा है ,

इतिहास ने राजा दशरथ को भी पुत्रमोह में मरते देखा है ।


इंद्रप्रस्थ पर इठलाते इक सुन्दर नारी को देखा है ,

भरी सभा में चीर हरण सहती उस पांचाली को भी देखा है ।


भाभी के बालों को खेंचकर सभा मे लाने वाले का दुस्साहस देखा है ,

इतिहास ने उस दुशाशन के रक्त से पांचाली के बालों को धोते देखा है।


चंद जर जमीं ज़ेवर पर मैंने लोगो को इतराते देखा है ,

अगले ही पल सब मिट्टी हो जाने पर मैंने उनको बौखलाते देखा है ।


पल छिन में रंक को राजा , राजा को रंक होते देखा है ,

दुनिया के इस मेले में मैंने कर्मों का ऐसा करतब होते देखा है।


बबूल बोये लोगों को मैंने कभी न आम खाते देखा है,

अपने अपने कर्मों का ऋण मैंने जन्मों चुकाते देखा है


तुम हम किस गिनती में ? मैंने मिट्टी होते हीरों को देखा है ,

कर्मों के ऐसे चक्रव्युह में फंसते मैंने कई वीरों को देखा है ।


कोई बच नहीं पाता कर्मों से , इनका कुछ ऐसा लेखा जोखा है ,

कर्म अटल है कर्म ही सत्य है बाकी सब तो धोखा है ।