जो बिक रहा है हवा पानी तो हैरान क्यों हो ?

ये तो होना ही था , इतना परेशान क्यों हो ?


इस विकासवाद की यात्रा में शामिल तो तुम भी थे

कंकरीट के जंगल बनाने में दो हाथ तो तुम्हारे भी थे

अब जो समय ने ली है करवट तो घबराये से क्यों हो ?

खुद की बनाई दुनिया मे घुटे घुटे से क्यों हो ?

अब जो बिक रहा है हवा पानी तो इतना हैरान क्यों हो ?

ये तो होना ही था , इतना परेशान क्यों हो ?


शहरों की झिलमिलाती झूठी चकाचौंध से ,आकर्षित तो तुम भी थे

बरगद की छांव छोड़ बड़ी बड़ी इमारतों में रहने को , मचले तो तुम भी थे

अब जो शहर ने दुत्कारा है तो मुरझाये से क्यों हो ?

अपने पसंदीदा शहर से भागे - भागे से क्यों हो ?

अब जो बिक रहा है हवा पानी तो इतना हैरान क्यों हो ?

ये तो होना ही था , इतना परेशान क्यों हो ?


बड़े मकान कुछ लाख करोड़ पैसों पर, इतराते तो तुम भी थे

सत्ता के गलियारे में पहचान होने पर , इठलाते तो तुम भी थे

अब जो भरे पड़े है शफ़ाखाना तो हड़बड़ाए से क्यों हो ? 

पैसा , पहचान ,सब मिट्टी हो जाने पर बौखलाए से क्यों हो ?

अब जो बिक रहा है हवा पानी तो इतना हैरान क्यों हो ?

ये तो होना ही था , इतना परेशान क्यों हो ?


समकित जैन "सारिकेय"